Lord shree Krishna : भगवान श्रीकृष्ण और उनकी पत्नी सत्यभामा की बात चीत |

Lord shree Krishna : भगवान श्रीकृष्ण और उनकी पत्नी सत्यभामा की बात चीत 

भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं – प्रिये ! यह कथा सुनकर राजा पृथु के मन में बड़ा आश्चर्य हुआ।*
*उन्होंने भक्तिपूर्वक देवर्षि नारद का पूजन करने के पश्चात् उन्हें विदा किया। इसलिये माघस्नान, कार्तिकस्नान तथा एकादशी – ये तीनों व्रत मुझे अत्यन्त प्रिय हैं।*

*वनस्पतियों में तुलसी, महीनों में कार्तिक, तिथियों में एकादशी तथा पुण्य – क्षेत्रों में द्वारकापुरी मुझे विशेष प्रिय हैं

वनस्पतीनां तुलसी मासानां कार्तिकः प्रियः । एकादशी तिथीनां च क्षेत्राणां द्वारका मम॥ (११४ । ३)

*जो अपनी इन्द्रियों को संयम में रखकर इन सबका सेवन करता है वह मुझे बहुत ही प्रिय होता है। यज्ञ आदि के द्वारा भी कोई मेरा ऐसा प्रिय नहीं हो सकता, जैसा कि पूर्वोक्त चारों के सेवन से होता है।*

*सत्यभामा बोलीं – नाथ !आपने मुझे जो कथा सुनायी है, वह बड़े ही आश्चर्य में डालने वाली है।*

*क्योंकि कलहा दूसरे के दिये हुए पुण्य से ही मुक्ति पा गयी। इस कार्तिक मास का ऐसा प्रभाव है और यह आपको इतना प्रिय है कि इसमें किये हुए स्नान-दान से कलहा के पति द्रोह आदि पाप भी नष्ट हो गये।*

*प्रभो ! जो दूसरे का किया हुआ पुण्य है, वह उसके देने से तो मिल जाता है; किन्तु बिना दिया हुआ पुण्य मनुष्य किस मार्ग से पा सकता है ?*

*भगवान श्रीकृष्ण ने कहा —

प्रिये ! सत्ययुग, त्रेता, और द्वापर में देश, ग्राम और कुल भी मनुष्य के किये हुए पुण्य और पाप के भागी होते हैं।*

*परन्तु कलियुग में केवल कर्ता को ही पुण्य और पाप का फल भोगना पड़ता है।*
*पढ़ाने से, यज्ञ कराने से अथवा एक पंक्ति में बैठकर भोजन करने से भी मनुष्य दूसरों के पुण्य और पाप का चौथाई भाग परोक्षरूप से पा लेता है।*

*एक आसन पर बैठने, एक सवारी पर चलने, श्वास का स्पर्श होने और परस्पर अङ्ग सट जाने से भी निश्चय ही – पुण्य पाप के छठे (६) अंश का फलभागी होना पड़ता है।*

*स्पर्श करने से, बातचीत करने से तथा दूसरे की स्तुति करने से भी मानव – पुण्य पाप के दशमांश (१०) को ग्रहण करता है।*

*देखने से, नाम सुनने से तथा मन के द्वारा चिन्तन करने से दूसरे के – पुण्य पाप का शतांश (सौ भागों में से एक भाग) भाग प्राप्त होता है।*

*जो दूसरे की निन्दा करता, चुगली खाता और उसे धिक्कार देता है, वह उसके किये हुए पातक को स्वयं लेकर बदले में अपने पुण्य को देता है।

परस्य निन्दां पैशुन्यं धिक्कारं च करोति यः । तत्कृतं पातकं प्राप्य स्वपुण्यं प्रददाति सः।। (११४। १७)

*एक पंक्ति में बैठकर भोजन करने वाले लोगों में से जो किसी को परोसने में छोड़ देता है, उसके – पुण्य का छठा (६) भाग उस छोड़े हुए व्यक्ति को मिल जाता है।*

*जो स्नान और सन्ध्या आदि करते समय किसी को छूता या उससे बातचीत करता है, उसे अपने कर्मजनित – पुण्य के छठे (६) अंश को उस व्यक्ति के लिये निश्चय ही देना पड़ता है।*

*जो धर्म के उद्देश्य से दूसरे मनुष्य से धन की याचना करता है, उसके पुण्य-कर्म के फल को धन देने वाला व्यक्ति भी पाता है।*

स्नानसन्ध्यादिकं कुर्वन् यः स्पृशेद्वा प्रभाषते । स कर्मपुण्यषष्ठांशं दद्यात्तस्मै सुनिश्चितम्।। (११४। २१)

*जो दूसरे का धन चुराकर पुण्य-कर्म करता है, उसका फल धनी को ही मिलता है, कर्म करनेवाले को नहीं।*

*जो मनुष्य दूसरे का ऋण चुकाये बिना ही मर जाता है, उसके पुण्य को धनी मनुष्य अपने धन के अनुसार बाँट लेता है।*

*कर्म करने की सलाह देनेवाला, अनुमोदन करनेवाला, सामग्री जुटानेवाला तथा बल से सहायता करनेवाला पुरुष भी – पुण्य पाप के छठे (६) अंश को पा लेता है।*

*राजा अपनी प्रजा से, गुरु शिष्य से, पति अपनी पत्नी से तथा पिता अपने पुत्र से उसके पुण्य-पाप का छठा (६) अंश प्राप्त करता है।*

*स्त्री भी यदि सदा अपने पति के मन के अनुसार चले और सदा उसे संतोष देनेवाली हो तो वह पति के पुण्य का आधा भाग प्राप्त करती है।*

*स्वयं धन देकर अपने नौकर या पुत्र के अतिरिक्त किसी भी दूसरे के हाथ से दान कराने वाले पुरुष के – पुण्य कर्मो के छठे (६) भाग को कर्ता ले लेता है।*

*वृत्ति देने वाला पुरुष वृत्तिभोगी के – पुण्य का छठा (६) अंश ले लेता है।*
*किन्तु यदि उसके बदले में उसने अपनी या दूसरे की सेवा न करायी हो, तभी उसे लेने का अधिकारी होता है।*

*इस प्रकार दूसरों के किये हुए पुण्य और पाप बिना दिये भी सदा आते रहते हैं। इस विषय में एक प्राचीन इतिहास है, जो बहुत ही उत्तम और पुण्यमयी बुद्धि प्रदान करनेवाला है, उसे सुनो।*

*पूर्वकाल की बात है, अवन्तीपुरी में धनेश्वर नामक एक ब्राह्मण रहता था। वह ब्राह्मणोचित कर्म से भ्रष्ट, पाप परायण और खोटी बुद्धिवाला था, रस, कम्बल और चमड़ा आदि बेचकर तथा झूठ बोलकर वह जीविका चलाता था।*

*उसका मन चोरी, वेश्यागमन, मदिरापान और जुए आदि में सदा आसक्त रहता था।*
*एक बार वह खरीद–बिक्री के काम से देश, देशान्तर में भ्रमण करता हुआ माहिष्मतीपुरी में जा पहुँचा, जिसकी चहारदीवारी से सटकर बहनेवाली पापनाशिनी नर्मदा सदा सुशोभित होती रहती है।*

*वहाँ कार्तिक का व्रत करने वाले बहुत-से मनुष्य अनेक गाँवों से स्नान करने के लिये आये थे। धनेश्वर ने उन सबको देखा।*

*कितने ही ब्राह्मण स्नान करके यज्ञ तथा देव पूजन में लगे थे। कुछ लोग पुराणों का पाठ करते और कुछ लोग सुनते थे। कितने ही भक्त नाच, गान, दान और वाद्य के द्वारा भगवान् विष्णु की स्तुति में संलग्न थे।*

*धनेश्वर प्रतिदिन घूम-घूमकर वैष्णवों के दर्शन, स्पर्श तथा उनसे वार्तालाप करता था। इससे उसे श्रीविष्णु के नाम सुनने का शुभ अवसर प्राप्त होता था।*

*इस प्रकार वह एक मास तक वहाँ टिका रहा। कार्तिक-व्रत के उद्यापन में भक्तपुरुषों ने जो श्रीहरि के समीप जागरण किया, उसको भी उसने देखा।*

*उसके बाद पूर्णिमा को व्रत करने वाले मनुष्यों ने जो ब्राह्मणों और गौओं का पूजन आदि किया तथा दक्षिणा और भोजन आदि दिये, उन सबका भी उसने अवलोकन किया।*

*तत्पश्चात् सूर्यास्त के समय श्रीशङ्करजी की प्रसन्नता के लिये जो दीपोत्सर्ग की विधि की गयी, उसपर भी धनेश्वर की दृष्टि पड़ी।*

*उस तिथि को भगवान् शङ्कर जी ने तीनों पुरोंका दाह किया था, इसीलिये भक्तपुरुष उस दिन दीपोत्सर्ग का महान् उत्सव किया करते हैं।*

*जो मुझ में और शिवजी में भेद-बुद्धि करता है, उसके सारे पुण्य-कर्म निष्फल हो जाते हैं – इसमें तनिक भी संदेह नहीं है।*

*धनेश्वर नर्मदा के तट पर नृत्य आदि देखता हुआ घूम रहा था। इतने में ही एक काले साँप ने उसे काट लिया।*

*वह व्याकुल होकर पृथ्वी पर गिर पड़ा। उसे गिरा देख बहुत-से मनुष्यों ने दयावश उसको चारों ओर से घेर लिया और तुलसी मिश्रित जल के द्वारा उसके मुख पर छींटे देना आरम्भ किया।*

*देहत्याग के पश्चात् धनेश्वर को यमराज के दूतों ने बाँधा और क्रोधपूर्वक कोड़ों से पीटते हुए वे उसे संयमनीपुरी को ले गये।*

*चित्रगुप्त ने धनेश्वर को देखकर उसे बहुत फटकारा और उसने बचपन से लेकर मृत्युपर्यन्त जितने दुष्कर्म किये थे, वे सब उन्होंने यमराज को बताये।*

*चित्रगुप्त बोले – प्रभो ! बचपन से लेकर मृत्युपर्यन्त इसका कोई पुण्य नहीं दिखायी देता। यह दुष्ट केवल पाप का मूर्तिमान् स्वरूप दीख पड़ता है, अतः इसे कल्पभर नरक में पकाया जाय।*

*यमराज बोले – प्रेतराज ! केवल पापों पर ही दृष्टि रखनेवाले इस दुष्ट को मुद्गरों से पीटते हुए ले जाओ और तुरंत ही कुम्भीपाक में डाल दो।*

*यमराज की आज्ञा पाकर प्रेतराज पापी धनेश्वर को ले चला। मुद्गरों की मार से उसका मस्तक विदीर्ण हो गया था।*

*कुम्भीपाक में तेल के खौलने का खलखल शब्द हो रहा था। प्रेतराज ने उसे तुरंत ही उसमें डाल दिया।*
*वह ज्यों ही कुम्भीपाक में गिरा त्यों ही उसका तेल ठंडा हो गया ठीक उसी तरह जैसे पूर्वकाल में भक्तप्रवर प्रह्लाद को डालने से दैत्यों की जलायी हुई आग बुझ गयी थी।*

*यह महान् आश्चर्य की बात देखकर प्रेतराज को बड़ा विस्मय हुआ। उसने बड़े वेग से आकर यह सारा हाल यमराज को कह सुनाया।*

*प्रेतराज की कही हुई कौतूहलपूर्ण बात सुनकर यमने कहा – ‘आह यह कैसी बात है !’ फिर उसे साथ ले वे उस स्थान पर आये और उस घटना पर विचार करने लगे।*

*इतने में ही देवर्षि नारद हँसते हुए बड़ी उतावली के साथ वहाँ आये। यमराज ने भलीभाँति उनका पूजन किया। उनसे मिलकर देवर्षि नारदजी ने इस प्रकार कहा।*

*नारदजी बोले – सूर्यनन्दन ! यह नरक भोगने के योग्य नहीं है; क्योंकि इसके द्वारा ऐसा कर्म बन गया है जो नरक का नाश करनेवाला है।*

*जो पुरुष पुण्य-कर्म करने वाले लोगों का दर्शन, स्पर्श और उनके साथ वार्तालाप करता है, वह उनके पुण्य का छठा अंश प्राप्त कर लेता है।*

*यह तो एक मास तक श्रीहरि के कार्तिक-व्रत का अनुष्ठान करने वाले असंख्य मनुष्यों के सम्पर्क में रहा है; अतः उन सबके पुण्यांश का भागी हुआ है।*

*उनकी सेवा करने के कारण इसे सम्पूर्ण व्रत का पुण्य प्राप्त हुआ है, अत: इसके कार्तिक-व्रत से उत्पन्न होनेवाले पुण्यों की कोई गिनती नहीं है।*

*कार्तिक-व्रत करने वाले पुरुषों के बड़े से बड़े पातकों का भी भक्तवत्सल श्रीविष्णु पूर्णतया नाश कर डालते हैं।*

*इतना ही नहीं, अन्तकाल में वैष्णव पुरुषों ने तुलसी मिश्रित नर्मदा के जल से इसको नहलाया है और श्रीविष्णु के नाम का भी श्रवण कराया है; इसलिये इसके सारे पाप नष्ट हो गये हैं।*

*अब धनेश्वर उत्तम गति प्राप्त करने का अधिकारी हो गया है। यह वैष्णव पुरुषों का कृपापात्र है, अत: इसे नरक में न पकाओ।*

*इसको अनिच्छा से पुण्य प्राप्त हुआ है; इसलिये यह यक्षयोनि में रहे और सम्पूर्ण नरकों के दर्शनमात्र से अपने पापों का भोग पूरा कर ले।*

*भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं – प्रिये ! यों कहकर देवर्षि नारदजी चले गये। फिर यमराज अपने सेवक के द्वारा उस ब्राह्मण को सम्पूर्ण नरकों का दर्शन कराने के लिये वहाँ से ले गये।*

*इसके बाद यम की आज्ञा का पालन करनेवाला प्रेतराज धनेश्वर को सम्पूर्ण नरकों के पास ले गया और उनका अवलोकन कराता हुआ इस प्रकार कहने लगा।*

*प्रेतराज ने कहा – धनेश्वर ! महान् भय देनेवाले इन घोर नरकों की ओर दृष्टि डालो। इनमें पापी पुरुष सदा यमराज के सेवकों द्वारा पकाये जाते हैं।*

*१. यह जो भयानक नरक दिखायी देता है, इसका नाम तप्तबालुक है :–*

*इसमें ये पापाचारी जीव अपनी देह दग्ध होने के कारण क्रन्दन कर रहे हैं। जो मनुष्य बलिवैश्वदेव के अन्त में भूख से दुर्बल हो घर पर आये हुए अतिथियों का सत्कार नहीं करते, वे अपने पापकर्म के कारण इस नरक में कष्ट भोगते हैं।*

*जो गुरु, अग्नि, ब्राह्मण, गौ, देवता तथा मूर्धाभिषिक्त राजाओं को लात मारते हैं, वे ही पापी यहाँ दृष्टिगोचर हो रहे हैं।*

*यहाँ तपी हुई बालू पर चलने के कारण इनके पैर जल गये हैं। इस नरक के छः अवान्तर भेद हैं। नाना प्रकार के पापों के कारण इसमें आना पड़ता है।*

*२. इसी प्रकार यह दूसरा महान् नरक अन्धतामिस्त्र कहलाता है :–*

*देखो, यहाँ सुई के समान मुँहवाले कीड़ों के द्वारा पापियों के शरीर विदीर्ण हो रहे हैं। यह नरक भयानक मुखवाले अनेक प्रकार के कीटों से ठसाठस भरा हुआ है।*

*३. यह तीसरा क्रकच नामक नरक है :–*

*यह भी बड़ा भयानक दिखायी देता है। इसमें ये पापी मनुष्य आरे से चीरे जाने का कष्ट भोगते हैं। *असिपत्रवन आदि भेदों से यह नरक छ: प्रकार का बताया गया है।*

*जो दूसरों का पली और पुत्र आदि से तथा अन्यान्य प्रियजनों से विछोह कराते हैं, वे ही लोग यहाँ कष्ट भोगते हैं। तलवार के समान पत्तों से इनके अङ्ग छिन्न-भिन्न हो रहे हैं और इसी भय से ये इधर-उधर भाग रहे हैं। देखो, ये पापी कितने कष्ट भोगते हैं और किस प्रकार इधर-उधर क्रन्दन करते फिरते हैं।*

*४. यह चौथा नरक तो और भी भयानक है। इसका नाम अर्गला है :–*

*देखो, यमराजके दूत नाना प्रकारके पाशों से बाँधकर इन पापियों को मुद्गर आदि से पीट रहे हैं और ये जोर जोर से चीख रहे हैं। जो साधु पुरुषों और ब्राह्मण आदि को गला पकड़कर या और किसी उपाय से कहीं आने-जाने से रोकते हैं, वे पापी यमराज के सेवकों द्वारा यहाँ यातना में डाले जाते हैं। *वध और भेदन आदि के द्वारा इस नरक के भी छः भेद हैं।*

*५. अब पाँचवें नरक पर दृष्टिपात करो। इसका नाम कूटशाल्मलि है :–*

*यहाँ जो ये सेमल आदि के वृक्ष खड़े हैं, ये सभी जलते हुए अंगारे के समान हैं। इसमें पापियों को यातना दी जाती है। परायी स्त्री और पराये धन का अपहरण करने वाले तथा दूसरों से द्रोह करनेवाले पापी सदा ही यहाँ कष्ट भोगते हैं।*

*६. यह छठा नरक और भी अद्भुत है। इसे रक्तपूय कहते हैं :–*

*इसमें रक्त और पीब भरा रहता है। इसकी ओर देखो तो सही, इसमें कितने ही पापी मनुष्य नीचे मुँह करके लटकाये गये हैं और भयानक कष्ट भोग रहे हैं। ये सब अभक्ष्य-भक्षण और निन्दा करनेवाले तथा चुगली खानेवाले हैं। कोई डूब रहे हैं, कोई मारे जा रहे हैं। ये सब-के-सब डरावनी आवाज के साथ चीख रहे हैं। *इस नरक के भी विगन्ध आदि छः भेद हैं।*

*७. यह सातवाँ नरक कुम्भीपाक है :–*

*धनेश्वर ! अब इधर दृष्टि डालो। यह भयङ्कर दिखायी देनेवाला सातवाँ नरक कुम्भीपाक है। यह तेल आदि द्रव्यों के भेद से छः (६) प्रकार का है। यमराज के दूत महापात की पुरुषों को इसी में डालकर औंटाते हैं और वे पापी इसमें अनेक हजार वर्षांतक डूबते-उतराते रहते हैं। देखो, वे भयानक नरक सब मिलाकर बयालीस (४२) हैं।*

*बिना इच्छा के किया हुआ पातक शुष्क कहलाता है और इच्छापूर्वक किये हुए पातक को आर्द्र कहा गया है। आर्द्र और शुष्क आदि भेदों से प्रत्येक नरक दो प्रकार का है।*

*इस प्रकार ये नरक पृथक्-पृथक् चौरासी (८४) की संख्या में स्थित हैं।*

*प्रकीर्ण, अपाङ्क्तेय, मलिनीकरण, जातिभ्रंशकर, उपपातक, अतिपातक और महापातक ये सात प्रकार के पातक माने गये हैं।*

*इनके कारण पापी पुरुष उपर्युक्त सात (७) नरकों में क्रमश: यातना भोगते हैं। तुम्हें कार्तिक-व्रत करनेवाले पुरुषों का संसर्ग प्राप्त हो चुका था, इसलिये अधिक पुण्यराशि का सञ्चय हो जाने से नरकों के कष्ट से छुटकारा मिल गया।*

*भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं –

सत्यभामा ! इस प्रकार प्रेतराज धनेश्वर को नरकों का दर्शन कराकर उसे यक्षलोकमें ले गया तथा वहाँ जाकर वह यक्ष हुआ।*

जय भगवान श्रीकृष्ण
कार्तिक मास में तुलसी वृक्ष के समीप शालग्राम या भगवान श्रीकृष्ण की पूजा करना चाहिए
👉 यद्यपि तुलसी वृक्ष उपलब्ध न हो तो ऑंवला वृक्ष के नीचे उक्त शुभ पूजा की जा सकती है
👉 #समुद्र मन्थन के दौरान जब भगवान विष्णु धन्वन्तरि के रूप में अमृत कलश लेकर आए, तब उनके प्रेमाश्रु की कुछ बून्दें अमृत कलश पर पड़ीं तो वहॉं गोलाकार तुलसी (वृन्दा) प्रकट हो गईं
👉 #कालान्तर में किसी प्रसंगवश वृन्दा की भस्म में पार्वती के बीज से तुलसी वृक्ष के रूप में प्रकट हुईं
👉 #तुलसी विवाह कार्तिक शुक्ल प्रबोधिनी एकादशी को किया जाता है, किन्तु विवाह उत्सव का आरम्भ कार्तिक शुक्ल नवमी से होता है
👉 #एकादशी के दिन तुलसी विवाह का संकल्प सन्ध्या के समय जब भगवान सूर्य कुछ दिखाई देते हों, तब करना चाहिए
👉 #कार्तिक मास में तुलसी वन लगाने, तुलसी पौधा रोपण करने तथा तुलसी पौधा दान करने का अत्यधिक महत्त्व है

 

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