ईमानदार लकड़हारा की कहानी क्या है (lakadhara hindi kahaniya in hindi)

गरीब लकड़हारा की कहानी | lakadhare ki kahani : आइए जानते हैं ईमानदार और गरीब लकड़हारे की कहानी से हमे क्या सीखने को मिलनेवाला है , ये कहानी हमे बहुत अच्छी बात सिखाएगी जो पूरे जीवन में काम आने वाली है

ईमानदार लकड़हारे की कहानी क्या है (lakadhara  hindi kahaniya in hindi)

गोपाल एक गरीब घर का लकड़हारा (lakadhara) था गोपाल का घर संसार लकड़ी काटकर और उसे बेचने से जो पैसा मिलता था उसी से चला था वह रोज जंगल में जाकर लड़कियां कटता था और जब शाम का समय हो तो उन्हें बाजार में ले जाकर बेच देता था लड़कियों को बेचने से जितने भी पैसे मिलते इस पैसों से गोपाल के परिवार का गुर्जर बसर होता रहता था। 

एक दिन की बात है जब गोपाल जंगल में दूर तक निकल जाता है वहां उसकी नजर में नदी के किनारे एक बड़े पेड़ पर जाती है. उसने मन ही मन में सोचा कि आज उसे बहुत ही ढेर सारी लड़कियां मिल जाएगी , जिसे बेचकर वह ज्यादा पैसे कमा लेगा।

गोपाल lakadhara की कुल्हाड़ी नदी में गिर जाती है

Gopal lakadhara अपनी कुल्हाड़ी को लेकर जैसे ही पेड़ पर चढ़ा और जैसे ही उसने पेड़ की डाली से एक दल काटना शुरू किया उसके हाथ से अचानक ही कुल्हाड़ी छूट जाती है . और नदी में गिर पड़ती है.

गोपाल झटपट से पेड़ से नीचे उतर जाता है और नदी में अपनी कुल्हाड़ी ढूंढने लगता है उसने बहुत कोशिश किया पर उसे लकड़हारे की कुल्हाड़ी नहीं मिली फिर उदास होकर वह पेड़ के नीचे जाकर बैठ गया . 

इतने ही नदी में से एक देवदूत वहां पर पहुंचे और उन्होंने गोपाल से पूछा कि गोपाल भाई आप उदास क्यों हो आपकी उदासी का कारण क्या है । 

लकड़हारा और देवता (lakadhara aur devta )

गोपाल ने उस देवता को अपनी पूरी कहानी बताई और बताया कि जैसे ही उसने पेड़ से एक दल काटने की कोशिश की तो अचानक कुल्हाड़ी नदी में गिर जाती है उस देवता ने उसे कहा कि घबराओ मत मैं तुम्हें वह लकड़ी काटने की कुल्हाड़ी लाकर देता हूं। 

गरीब और अमीर दो लकड़ों की कहानी

ऐसा बोलकर उस देवता ने नदी में डुबकी लगा दी और उसे एक सोने की कुल्हाड़ी लाकर दी और उसे देवता ने गोपाल से कहा कि क्या यह ही कुल्हाड़ी तुम्हारी कुल्हाड़ी है ? 

तो गोपाल ने कहा नहीं महाराज यह कुल्हाड़ी तो मेरी नहीं लगती है मेरी कुल्हाड़ी तो लोहे की है यह तो सोने की कुल्हाड़ी दिख रही है यह किसी और की कुल्हाड़ी होगी। 

लकड़हारे की ईमानदारी पर देवता खुश हुए

 फिर दूसरी बार डुबकी लगाकर उसे देवता ने चांदी की कुल्हाड़ी निकाल कर जब चांदी की कुल्हाड़ी को गोपाल के सामने उस देवता ने प्रस्तुत किया। 

 तब भी उस गोपाल लकड़हारे (gopal lakadhare) ने इनकार करते हुए कहा कि यह कुल्हाड़ी तो मेरी नहीं लग रही है क्योंकि मेरी कुल्हाड़ी तो लोहे की थी । और यह चांदी की कुल्हाड़ी है । 

तो उस देवता ने फिर से नदी में जाकर डुबकी लगाई और इस बार उन्होंने वही लोहे की कुल्हाड़ी निकाली और उस भोपाल लकड़हारे को दिखाते हुए कहा कि गोपाल क्या यह कुल्हाड़ी तुम्हारी कुल्हाड़ी है तो गोपाल ने बोला हां महाराज यही मेरी कुल्हाड़ी है । 

लोहे की कुल्हाड़ी , सोने की कुल्हाड़ी और चांदी की कुल्हाड़ी

यही लोहे की कुल्हाड़ी है जो कि एकदम मेरी कुल्हाड़ी है गोपाल खुश हो गया था . गोपाल की ईमानदारी को देखकर देवता बहुत खुश हो गए , और बोले कि भाई लोहे की कुल्हाड़ी के साथ-साथ तुम्हें इस सोने की कुल्हाड़ी और चांदी की कुल्हाड़ी भी मैं इनाम में दे रहा हूं फिर गोपाल लकड़हारे ने देवता का बहुत आभार व्यक्त किया। 

Conclusion – लकड़हारा (lakadhara) the best hindi story

एक lakadhara जंगल में नदी के किनारे पेड़ पर लकड़ी काटने जाता है कुल्हाड़ी पानी में गिर जाती है लकड़हारा नाराज हो जाता है उदास हो जाता है। फिर वहां पर 1 देवता आते हैं और उसके कुल्हाड़ी निकालने के लिए उस नदी में डुबकी लगाते हैं और सबसे पहले सोने का कुल्हाड़ी उसे लकड़हारे को देते हैं ।

और बोलते हैं कि यह सोने की कुल्हाड़ी क्या तुम्हारी है उस लकड़हारा ने बोला कि यह मेरी नहीं है फिर वह देवता चांदी की कुल्हाड़ी ला कर देते हैं ।

लकड़हारा (lakadhara) बोलता है यह कुल्हाड़ी मेरी नहीं है फिर वही देवता लोहे की कुल्हाड़ी लाकर देते हैं लकड़हारा स्वीकार कर लेता है और बोलता है कि है महाराज यही लोहे की कुल्हाड़ी मेरी कुल्हाड़ी है। इस लकड़हारे की ईमानदारी को देखते हुए , पानी से निकले देवता उसे सोने और चांदी की कुल्हाड़ी भी इनाम में दे देते हैं और वह लकड़हारा खुश हो जाता है। 

इस कहानी से मिली सिख : ईमानदारी एक ऐसा गुण है जो हमेशा मीठा ही फल देता है 

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